नंदी गौ विवाह की अनूठी परम्परा! जहां बछड़ा-बछड़ी भी सजते है दूल्हा-दुहन की तरह

नंदी गौ विवाह की अनूठी परम्परा! जहां बछड़ा-बछड़ी भी सजते है दूल्हा-दुहन की तरह
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बाड़मेर : राजस्थान की संस्कृति काफी गौरवशाली है। देश ही नहीं विदेशों के लोग भी राजस्थान की संस्कृति को काफी पसंद करते हैं। इस बीच बाड़मेर में एक ऐसी अनूठी परंपरा सामने आई है। जिसको सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे। दरअसल, बाड़मेर और पश्चिमी राजस्थान में गौ नंदी विवाह यानी वृषोत्सर्ग परंपरा काफी प्रचलित है। इसके पीछे कई धार्मिक मान्यताएं हैं, वहां के लोग पितृ दोष दूर करने और पूर्वजों की मोक्ष की कामना से इस परंपरा का निर्वहन करते हैं। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर एक बार फिर से वायरल हो रहा है, जो लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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पश्चिमी राजस्थान में इंसानों की तरह होता है गौ नंदी विवाह

सोशल मीडिया में फिर से राजस्थान की अनूठी संस्कृति और परंपरा का एक वीडियो वायरल हो रहा है। जिसमें गाय की बछड़ी और बछड़े को दूल्हे की तरह सजाकर उनका पूरे रीति रिवाज के साथ विवाह करवाया जा रहा है। वीड़ियो में बछड़े ने सिर पर दूल्हे की तरह सेहरा पहन रखा है। साथ ही बछड़ी ने लाल चुनरी ओढ़ रखी है। ग्रामीण दोनों को अग्नि कुंड के चारों और सात फेरे दिला रहे हैं। वीडियो में कई ग्रामीण भी नजर आ रहे हैं। नंदी गौ विवाह की बाड़मेर समेत पश्चिमी राजस्थान में यह काफी प्रचलित धार्मिक मान्यता है। इसके पीछे यहां के लोगों का मानना है कि यह विवाह शुभ होता है।

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नंदी गौ विवाह के पीछे यह है मान्यता

बाड़मेर सहित पश्चिमी राजस्थान में नंदी गौ विवाह यानी वृषोत्सर्ग परंपरा अनूूठी पहचान बनाए हुए हैं। इसके पीछे लोगों की कई तरह की मान्यताएं और विश्वास भी हैं। ग्रामीणों ने बताया कि इस रस्म को करने से घर के पितरों को शांति मिलती है और पितृ दोष समाप्त होता है। यह नहीं हिंदू धर्म के अनुसार वैशाख पूर्णिमा या अन्य पवित्र तिथियां पर इस प्रथा को पूरी करते हुए विवाह करवाया जाए तो मोक्ष की प्राप्ति होती है और पूर्वजों को वैतरणी नदी पार करने में गौ माता अपनी कृपा करती है। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि इस विवाह से उस गांव और परिवार में सुख समृद्धि बढ़ती है। साथ ही लोगों के वंश की वृद्धि भी होती है।

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बछड़ा बारात लेकर पहुंचता है, विवाह के लिए

इस अनूठी मान्यता के अनुसार गांव के लोग बछड़े को दूल्हे की तरह सजाते हैं, उसे साफा पहनकर तैयार किया जाता है। इसके बाद ढोल नगाड़ों के साथ बछड़े की बारात निकाली जाती है। आयोजन स्थल पर विवाह का मंडप भी सजाया जाता है, जहां पंडित मंत्रोच्चार के साथ बछड़ा और बछड़ी का विवाह संपन्न कराते हैं। इस दौरान दोनों को हवन कुंड के चारों तरफ फेरे भी दिलाए जाते हैं। यही नहीं आयोजन को लेकर लोगों के भोजन का कार्यक्रम भी होता है। जिसमें हलवा पुरी खिलाया जाता है। इस दौरान महिलाएं मंगल गीत भी गाती है। यह प्रथा पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर, फलोदी सहित स्थानों में ज्यादा देखने को मिलती है।

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मनीष बागड़ी, Author

पॉलिटिकल आर्टिकल्स लिखना पसंद है, पत्रकारिता में 20 वर्ष से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में नवभारत टाइम्स (NBT) में 'स्टेट पॉलिटिकल आर्टिकल्स' लिखता हूं, पत्रकारिता के इस सफर में राजस्थान पत्रिका, A1टीवी, न्यूज़ इंडिया, Network 10, हर खबर न्यूज़ चैनल, दैनिक रिपोर्टर्स.com जैसे न्यूज़ प्लेटफार्म पर भी कार्य किया है।Follow us - manishbagdi.reporter@gmail.com, www.thepoliticaltimes.live,
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